सोम प्रदोष व्रत, जो हर महीने की त्रयोदशी तिथि को सोमवार को मनाया जाता है, भगवान शिव के लिए समर्पित होता है। इसमें विधिपूर्वक भगवान शिव का पूजन करके सोम प्रदोष व्रत कथा पढ़ी जाती है
यह उपवास खासतौर पर शांति, समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद साबित होता है।
इसका पालन करने से पराणे पापों का नाश होता है, मानसिक शांति मिलती है और जीवन की कठिनाइयां कम होती हैं।
पूजा सुबह के समय अदा की जाती है, प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में, जहाँ शिवलिंग पर पानी, दूध और फूल चढ़ाए जाते हैं।
ईमानदारी से इस व्रत का पालन करने से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सबसे पहले विधि पूर्वक “सोम प्रदोष व्रत विधि” का पालन कर पूजन करें और फिर व्रत कथा प्रारंभ करें।
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सोम प्रदोष व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है, किसी नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी,उसके पति का स्वर्गवास हो गया था।उसका कोई सहारा नहीं था इसलिए वह सुबह होते ही अपने बेटे के साथ भीख मांगने चली जाती थी। वह खुद को और अपने बेटे का पेट पालती थी।
एक दिन घर लौटते समय, रास्ते में उसे घायल अवस्था में एक बालक करहता हुआ दिखा। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विधर्व का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था।
वह हमारा मारा फिर रहा था। राजकुमार, ब्राह्मण पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।एक दिन अंशुमती नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमती अपने माता-पिता के साथ राजकुमार से मिलने गई। उनको भी राजकुमार पसंद आ गया।
कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को भगवान शंकर ने स्वप्न में आदेश दिया,की राजकुमार और अंशुमती का विवाह कर दिया जाए। वैसा ही किया गया। ब्राह्मणी प्रदोष व्रत के साथ ही भोलेनाथ की पूजा किया करती थी। प्रदोष व्रत के प्रभाव और गंधर्व राज्य की सेना की सहायता से राजकुमार ने विधर्व नगरी से शत्रुओं को खदेड दिया। और पिता के साथ फिर से सुखपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया।
हे भोलेनाथ जैसे प्रदोष व्रत के प्रभाव से ब्राह्मणी के दिन बदले वैसे ही इस कथा को कहते,सुनते और हुंकार भरते सभी पर कृपा करना।
।। सोम प्रदोष व्रत कथा समाप्त।।
।। जय भोलेनाथ।।